ईश्वर* मनुष्य* और जगत*


प्रिय मित्रो ! *** ईश्वर* मनुष्य* और जगत* ये तीनों प्रमुख तत्त्व हैं. इन तीनों का अपना-अपना महत्व है. इनमें पहला ईश्वर* जो सर्वात्मा, सर्वाधार है . दूसरा मनुष्य* जो जगत का सबसे महत्वपूर्ण अंग और इसका केन्द्र बिंदु है . तथा तीसरा जगत* जोकि मनुष्य की कल्याणकारी प्रयोगशाला और उसका कर्तव्य लोक है. जहाँ उसे स्वयं को प्रमाणित करने का सुअवसर प्राप्त होता है. *** ईश्वर ने अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति को माध्यम बनाकर जगत की रचना की. और यहाँ अनेक जीव-जंतुओं के साथ-साथ वह सभी कुछ उत्पन्न किया, जो कि आज चहुँ-ओर उपलब्ध है. उसने अन्य जीवों के साथ-साथ एक जीव ऐसा भी रचा ,जो कि उन सबसे पूर्णतःभिन्न था. क्योंकि ईश्वर ने उसे एक अत्यंत अद्भुत तत्त्व प्रदान कर दिया. और वह तत्त्व था, बुद्धि-तत्त्व . उस बुद्धि-तत्त्व की प्राप्ति के पश्चात वह जीव, जगत में ईश्वर की अति विशिष्ट एवं सर्वोत्कृष्ट कृति बन गया, और बुद्धि युक्त वही जीव मनुष्य कहलाया. *** जगत में मनुष्य होना एक बहुत बड़ा सौभाग्य है. क्योंकि अपने बुद्धि बल के द्वारा वह सत्य को जान सकता है, स्वयं को पहचान सकता है. ईश्वर ने मनुष्य को यह बुद्धि बल इसी लिए प्रदान किया, जिससे कि वह इसका उपयोग कर, सह-कल्याण भाव को प्राप्त हो सके. और मानवीय आधार पर एक दूसरे के हित में, सम्पूर्ण विश्व को सह-नेतृत्व प्रदान कर सके.*** मानव और मानव के बीच यह सह-कल्याण का भाव ही मानवता है. और यह मानवता ही मानवधर्म है. जो कि ईश्वर द्वारा मनुष्य को वरदान स्वरूप प्राप्त हुआ है. और एक अनुपम प्राकृतिक उपलब्धि एवं धर्म का स्वाभाविक स्वरुप है. *** मानवधर्म के इस दर्शन और इस चिंतन को सही दिशा में ले जाने के लिए पूरे विश्व को मानस मंथन करना होगा. और मानवता के इस मर्म को अपने अन्तःकरण में उतारना होगा. ईश्वर द्वारा प्राप्त इस स्वाभाविक धर्म की व्यापकता एवं गहनता को आत्मसात कर ही हम विश्व शांति और सद्भाव की सोच को सही दिशा एवं सही स्वरुप प्रदान कर पाएंगे. लक्ष्य कठिन हो सकता है, किन्तु पुरुषार्थ के समक्ष असंभव नहीं है. क्योंकि सत्य केन्द्रित प्रयासों में सफलता निश्चित है. – स्वामी अशेषानन्द